More Human, less humanity
To people fighting the wars of black and white
To people fighting the wars of religion and beliefs
To people fighting the wars of justice and injustice
To people fighting the wars of poor and rich
Let's fight a bigger war
Let's fight the wars of humanity
If we were better at being humans -
We would not have been acted inhuman!
Natural calamities are the punishment!
To our fellow humans
who thinks they are actuallly humans!!
We would save life and we would make
better life to live for us, for whole world if we were better at being human, we would become better version of yourself and have a better world to live.
Do you think that Education is only designation of human race?
That's wrong
HUMANITY and COMMON SENSE are.
आज भी हम उस युग में जी रहे हैं जहां हमने आसमान को तो छू लिया है, तरक्की की नई-नई ऊंचाइयों पर खड़े हैं हम पर अपने जमीर को, इंसानियत को हम खो बैठे हैं।
हम सबने खुद को हिन्दू , मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि में तो बांट लिया है। लेकिन हम शायद हर बार ये भूल जाते हैं कि मानवता का कोई धर्म नहीं होता वो किसी मज़हब से नहीं बंधी है। इंसानियत किसी धर्म- मज़हब की मोहताज नहीं हैं। पर हम क्या कर रहे हैं आए दिन इंसानियत को शर्मसार कर रहे हैं। कभी धर्म के नाम पर मज़हब के नाम पर हम एक-दूसरे की जान के प्यासे बन जाते हैं। कभी उसी धर्म को सहारा बनाकर हम लोगों में डर फैलाते हैं। हम ये बार-बार भूल जाते हैं कि धर्म का सबसे बड़ा उद्देश्य मानवता की रक्षा करना हैं।
इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं हैं। जहां हममें इंसानियत मर गई हो वहां धर्म भी खत्म।
हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां हम इंसानियत की बड़ी- बड़ी बातें तो करते हैं। पर हम अंदर से खोखले बनते जा रहे हैं। हम इंसानियत का हर रोज जनाज़ा निकाल रहे हैं। यहां हर इंसान जल्दी में हैं उसे बस खुद से मतलब है। किसी के दर्द तकलीफ से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता हां पर जब बात खुद पर आती है हमारी तब हम इसी इंसानियत का हवाला देकर खुद के लिए रहम की भीख मांगने को मजबूर हो जाते हैं। इंसान जितना तरक्की कर रहा है नई-नई ऊंचाइयों को छू रहा है उतना ही वो अपनी जमीन से कटता जा रहा है। हम विज्ञान के तकनीकी के क्षेत्र में तो आगे निकल आए लेकिन दया, करूणा जैसे आदर्शों को कहीं दूर बहुत दूर पीछे छोड़ आए हैं।
हम आए दिन प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं उसके बनाए नियमों को अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए गलत प्रयोग कर रहे हैं।
जिस प्रकृति ने हमें हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सबकुछ दिया उसी को हम खत्म करने पर तुले हैं।
प्रकृति ने हमें पीने के लिए स्वच्छ जल दिया, रहने के लिए छत दी, खाने के लिए अन्न दिया, आज हम उसी प्रकृति के शत्रु बनते जा रहे हैं। हम अपने लाभ की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करते जा रहे हैं। प्रकृति को उसके साधनों को हानि पहुंचाना हमारी संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता हैं।
हम मानवता का हर दिन नाश करने पर आतुर है। प्रकृति की जैविक सम्पत्ति को हानि पहुंचाना मानवता के आचरण को दूषित करना है। हम ऐसा करके प्रकृति को हीं नहीं अपितु खुद को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं क्योंकि आने वाले कल के लिए हम खुद को और निसहाय बना रहे हैं। जब तक मनुष्य प्रकृति को कष्ट पहुंचाता रहेगा वो सुख और शांति से दूर जाता रहेगा।
हम ये भूल रहे हैं जिस प्रकृति ने हमें हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सबकुछ दिया है वो समय आने पर विकराल रूप धारण कर हमसे हमारा सबकुछ छीन भी सकती हैं।
आए दिन विनाश के कगार पर खड़ा मनुष्य आज भी आंखों पर लालच की पट्टी बांधे खड़ा हैं। पर वो दिन अब ज़्यादा दूर नहीं जब प्रकृति अपना सौम्य रूप छोड़ विनाशक रूप धारण करेगी और बस त्राहि त्राहि का मंजर नज़र आएगा चारों तरफ। अब हम मानवता के अन्त शिखर की ओर बढ़ते जा रहे हैं जहां सिर्फ तबाही है सिर्फ तबाही।


Absolutely right....if you play with nature, then nature will play with you✌
ReplyDeleteHmne nature ko bhut harm kia h ab nature apna revenge le rhi h...agr Hm sb ab bhi nhi sudhre toh sb the end ho jayega.